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नवरात्रि में क्यों बोया जाता है जंवारा: दुर्गा माता से जुड़ी है इसकी मान्यता, जानिए इसका महत्व...  

नवरात्रि में क्यों बोया जाता है जंवारा: दुर्गा माता से जुड़ी है इसकी मान्यता, जानिए इसका महत्व...  

Navratri 2025 : नवरात्र पर्व का सनातन धर्म में बेहद महत्व माना जाता है। भारत में सभी जगह माँ दुर्गा के अलग-अलग रूपों की पूजा-अर्चना होती है। नवरात्रि परब में माता के नौ रूपों की आराधना की जाती है। इसमें चैत्र नवरात्र हो या शारदीय नवरात्र हो दोनों में ही मां भगवती दुर्गा के नौ रूपों की विधि विधान से पूजा की जाती है।  छत्तीसगढ़ में नवरात्रि बड़े ही धूमधाम से यहां के  ऐतिहासिक मंदिरों में मनाया जाता है। छत्तीसगढ़ के प्रमुख शक्तिपीठों में यानी चंद्रपुर, रतनपुर, खल्लारी, दंतेवाड़ा और डोंगरगढ़ प्रमुख है।  

देवी मंदिरों में जावरा बोने की परंपरा :

नवरात्री में जवारा बोने की विशेष परंपरा है जो सदियों से चली आ रही है। नवरात्रि में घटस्थापना के दिन जवारा बोया जाता है, और देवी मंदिरों में अखंड ज्योत  जलाई जाती हैं। मान्यता है कि माता आदिशक्ति दुर्गा की पूजा बिना जवारा के बिना अधूरी मानी जाती है। सनातन धर्म के मन्यताओं के मुताबिक जवारा खुशहाली का प्रतीकमन जाता है।  छत्तीसगढ़ की संस्कृति में माता दुर्गा की पूजा सामुदायिक रूप से की जाती है और जंवारा बोया जाता है। पुराणों के अनुसार जंवारा की उत्पत्ति महाभारत काल से मानी जाती है। माना जाता है कि पांडवों ने संध्या प्रहर में द्रौपदी को दुर्गा मां का स्वरूप मानकर जंवारा बोकर पूजा की थी। तभी से जंवारा बोने की परंपरा नवरात्र के समय प्रत्येक देवी मंदिरों में किया जाता है।

जंवारा का विशेष महत्व :

प्रत्येक देवी मंदिरों में नवरात्र के प्रथम दिन से बांस की टोकरी में जौ और गेहूं बोया जाता है, जिसे जंवारा कहा जाता है। नौ दिनों तक माता की आराधना कर स्तुति करते हैं। लोक मान्यता है, कि सेवागीत करने से, सेवा गाने से जंवारा तेजी से बढ़ता है।लोकमान्नस में प्रचलित है कि दो-तीन दिन में अगर जौ बहुत अच्छे से उगता है, तो देवी माता की कृपा सब पर बनी रहती है, और सब मंगलमय होता है। अगर जौ में अंकुरण सही से नहीं होता है तो वह शुभ संकेत नहीं माना जाता।

विसर्जन को लेकर अनोखी परंपरा :

दसवें दिन जब जंवारा का विसर्जन किया जाता है, तब विसर्जन करने वाले जंवारा को, बदकर मित्रता करने की परंपरा है। ग्रामीण अंचल के लोग विसर्जित करने वाले जंवारा को एक दूसरे के कानों में लगा कर गले मिलते हैं और तब से उनमें मित्रता हो जाती है और वह अटूट रहता है साथ ही उसका नाम नहीं पुकारा जाता था। संबोधन में भी जंवारा कह करके गले मिलते हैं। वर्तमान समय में ग्रामीण अंचल में और शहरी अंचल में जंवारा बदकर मित्रता करने की परंपरा खत्म हो रही है।
 


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