दिनेश निगम ‘त्यागी’ : क्या केंद्रीय मंत्री ज्योतिरािदत्य सिंधिया के समर्थकों काे भाजपा में घुटन महसूस होने लगी है? क्या भाजपा में सिंधिया कमजोर किए जा रहे हैं? इस तरह के तमाम सवाल इन दिनों राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय हैं। इसका आधार बना है सिंधिया के कट्टर समर्थक प्रदेश के ऊर्जा मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर द्वारा एक सार्वजनिक कार्यक्रम में दिया गया बयान। मंच पर खुद सिंधिया मौजूद थे। तोमर का कहना था कि भाजपा में ग्वालियर की उपेक्षा हो रही है।
उन्होंने सिंधिया से आग्रह किया कि वे सीमा रेखा लांघ कर भाजपा नेतृत्व से आर-पार के मूड में बात करें। इससे सिंधिया समर्थकों की संगठन और सरकार से नाराजगी का पता चलता है। यह स्थिति अचानक नहीं बनी। खबर है कि सिंधिया को उनके लोकसभा क्षेत्र गुना-शिवपुरी तक सीमित कर दिया गया है। केंद्र में मंत्री बनने के बाद उन्होंने ग्वालियर में अफसरों की एक बैठक ले ली थी तो वहां के सांसद ने कड़ी आपत्ति जताई थी। इसके बाद सिंधिया को ग्वालियर से दूर कर दिया गया। मुरैना में एक बड़ा कार्यक्रम हुआ, उसमें मुख्यमंत्री के साथ स्पीकर नरेंद्र सिंह तोमर थे। कांग्रेस सांसद विवेक तन्खा भी पहुंचे लेकिन सिंधिया को नहीं बुलाया गया। स्पष्ट है कि पूरे अंचल का नेतृत्व करने वाले सिंधिया अब अपने लोकसभा क्षेत्र तक सीमित हैं। अंचल के बारे में उनकी राय को तवज्जो नहीं मिल रही।
स्पीकर नरेंद्र तोमर ने जगा दी उम्मीद की किरण....!
विधानसभा के स्पीकर नरेंद्र सिंह तोमर भाजपा के वरिष्ठ नेता हैं और संसदीय ज्ञान के जानकार भी। लगभग हर दल का सदस्य उनका सम्मान करता है। संभवत: इसी कारण सदन के पिछले दो सत्रों को देखकर उम्मीद जागी है कि तोमर चाहेंगे तो प्रदेश में लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर विधानसभा की साख और गरिमा बहाल हो सकती है। हालांकि इसके लिए सख्त होने और बहुत सारा काम करने की जरूरत होगी।
कई साल बाद विधानसभा के दो सत्र ऐसे रहे, जिनकी पूरी बैठकें हुईं और सदन की कार्रवाई पूरे समय तक चली। इसका श्रेय निश्चिततौर पर सत्तापक्ष और विपक्ष से ज्यादा स्पीकर तोमर को देना होगा। विपक्ष को अपनी बात कहने का अवसर मिला। उसने अपना विरोध भी दर्ज कराया और सदन भी चला। यह स्पीकर तोमर के प्रयास का ही नतीजा है। हालांकि इस बार पूर्व मंत्री भूपेंद्र सिंह और उप नेता प्रतिपक्ष हेमंत कटारे के बीच अप्रिय संवाद भी हुआ। इसके लिए स्पीकर तोमर को व्यवस्था देने के साथ भावुक आग्रह करना पड़ा। बावजूद इसके अब भी विधानसभा सत्र कम अवधि के लिए बुलाए जा रहे हैं और कई बार विपक्ष को लगता है कि स्पीकर तोमर सत्तापक्ष के पक्ष में झुक जाते हैं। यदि इन मसलों पर सुधार हो जाए और कुछ सदस्यों के बड़बोलेपन पर अंकुश लग जाए तो लोकतंत्र का यह मंदिर फिर अपने साख की धाक जमा सकता है।
मंत्री जी का बयान ‘चोरी और सीना जोरी’ जैसा....!
जिस रेत माफिया ने बुंदेलखंड, नर्मदांचल के साथ चंबल-ग्वालियर अंचल में आतंक मचा रखा है। जिसकी वजह से आला अफसर तक अपनी जान गंवा चुके हैं। जो माफिया आए दिन अफसरों, सरकारी अमले पर हमले करता है, वाहन चढ़ा कर जाने लेने की कोशिश करता है। पुलिस थानों और वन दफ्तरों में हमले कर गाड़ियों और आरोपियाें को छुड़ा लेता है। ऐसे माफिया का मामला विधानसभा के अंदर बजट सत्र में गूंजा और कार्रवाई की मांग उठी, तब प्रदेश सरकार के मंत्री एंदल सिंह कंसाना माफिया के बचाव में खड़े हो गए।
उन्होंने कहा कि यह रेत माफिया नहीं, पेट माफिया है। यह अपने पेट के खातिर रेत का व्यापार करता है। मंत्री कंसाना का यह बयान ‘चोरी और सीना जोरी’ जैसा तब साबित हुआ जब चंबल अंचल में वन विभाग के अमले ने अवैध रेत से भरी गाड़ी पकड़ी तो ड्राइवर ने कह दिया कि यह मंत्री एंदल सिंह के बेटे बंकू कंसाना की है। उसने यह भी बता दिया कि वे अवैध रेत का काराेबार लंबे समय से कर रहे हैं। क्या मंत्री जी अब कहेंेगे कि उनका बेटा भी पेट माफिया है? हालांकि इसकी बजाय हर नेता की तरह उन्होंने कह दिया है कि मुझे बदनाम करने के लिए राजनीतिक साजिश के तहत बेटे का नाम लिया गया है। बहरहाल, कांग्रेस मंत्री कंसाना पर हमलावर है और उनके इस्तीफ की मांग कर रही है।
न नेता जी की भाषा मर्यादित, न ही साधु-संतों की....!
कांग्रेस के वरिष्ठ विधायक राजेंद्र कुमार सिंह द्वारा सतना में दिया गया एक बयान और उस पर साधु-संतों की प्रतिक्रिया सप्ताह के सबसे चर्चित मुद्दों में से एक हैं। न साधु-संतों को लेकर राजेंद्र सिंह द्वारा की गई टिप्पणी मर्यादित थी और न ही साधु-संतों की प्रतिक्रिया। साधु-संतों की भाषा तो नेता जी से भी ज्यादा अमर्यादित थी। राजनेता कुछ भी बोलते रहते हैं लेकिन समाज साधु-संतों से शालीनता की उम्मीद करता है। राजेंद्र सिंह ने कहा था कि ‘भाजपा ने साधु-संत, संन्यासी, बाबा बैरागी और महामंडलेश्वरों को जनता के बीच छोड़ दिया। कह दिया कि जाओ हिंदुत्व की बात करो, भाजपा का प्रचार करो, सनातन की बात करो। और ये सांड.. चर रहे हैं दूसरों का खेत।’ इसमें आपत्तिजनक बात संतों की सांड से तुलना है। राजेंद्र सिंह जैसे वरिष्ठ नेता को ऐसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। जवाब में संतों ने कहा कि ‘संत विधायक को दौड़ा दौड़ा कर पीटेंगे और सिर काट कर वध करेंगे।’
सवाल है क्या यह भाषा संतों की हो सकती है। बाद में राजेंद्र सिंह ने सफाई में कहा कि ‘सांड का मतलब नंदी होता है और नंदी भगवान शिव की सवारी है जिन्हें हम पूजते हैं। मैं हमेशा संतों का सम्मान करता हूं। मैंने कई मंदिर बनवाए हैं। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए भी चंदा दिया है। मेरी बात को गलत ढंग से लिया गया।’ साफ है कि नेता जी की तुलना में संत ज्यादा उग्र और गलत हैंे।
सच नहीं निकले भूपेंद्र-हेमंत के सदन में दिए बयान....!
विधानसभा प्रदेश में लोकतंत्र का सबसे बड़ा मंदिर है। विधायकों से उम्मीद की जाती है कि इस मंदिर में खड़े होकर वे झूठ न बोलें। मर्यादित आचरण करें और मर्यादित भाषा का उपयोग भी। ऐसा न करने से लोकतंत्र के इस मंदिर की गरिमा तार-तार होती है। बजट सत्र में भाजपा के वरिष्ठ नेता और विधायक भूपेंद्र सिंह से भी ऐसा हो गया, अपेक्षाकृत नए लेकिन जिम्मेदार पद पर बैठे उप नेता प्रतिपक्ष हेमंत कटारे ने भी अपरिपक्वता का परिचय दिया। सदन के अंदर दोनों ने भाषा की मर्यादा का ख्याल नहीं रखा और असत्य बातें भी कहीं। जैसे,भूपेंद्र ने हेमंत को फर्जी उप नेता प्रतिपक्ष कहा। दूसरी तरफ हेमंत ने कहा कि उप मुख्यमंत्री पद के बारे में भी ऐसा बोल कर बताईए क्योंकि ये पद भी संविधान में नहीं हैं।
बाद में पता चला की दोनों द्वारा कही गई बात सत्य नहीं थी। विधानसभा के प्रमुख सचिव एपी सिंह ने 25 जनवरी 2024 को पत्रक भाग 2 के तहत हेमंत कटारे को मध्य प्रदेश कांग्रेस विधायक दल के उप नेता की सूचना जारी की थी। इसी तरह 30 दिसंबर 2023 को सामान्य प्रशासन विभाग के अपर मुख्य सचिव विनोद कुमार ने मोहन कैबिनेट के मंत्रियों को शासन कार्य आवंटन कार्य के तहत अधिसूचना जारी की थी। इसमें दोनों उपमुख्यमंत्रियों को पद के साथ विभाग आवंटन की भी सूचना है। साफ है कि दोनों पदों को वैध माना गया है।